भारत की इस गलती की वजह से पाकिस्तान आज है परमाणु संपन्न राष्ट्र

आइये जानते हैं महात्मा गाँधी की विचारधारा ने पाकिस्तान को परमाणु सम्पन्न राष्ट्र बनने में कैसे सहयोग किया।
बात 1977 की है , जब पहली बार गैर कांग्रेसी सरकार बनी और मोरार जी देसाई प्रधानमंत्री बने। देसाई एक गाँधीवादी आदमी थे। जिन्होंने सत्ता में आते ही गाँधीवादी विचारों की बागवानी शुरू कर दी।

18 मर्ई 1974 के पोखरण परमाणु परीक्षण के बाद पाकिस्तान के द्वारा भी परमाणु बम बनाने की सुगबुगाहट शुरू हो गई। अतः RAW और MOSAD ने मिलकर एक साझा आपरेशन शुरू किया।जिसके तहत सर्वप्रथम इस खबर की सच्चाई का पता लगाना था।

रावलपिंडी के काहुट नामक क्षेत्र में स्थित परमाणु संयंत्र में बम बनाने की तैयारियाँ चल रहीं थीं। RAW के एजेंट वहाँ फैल गए। परमाणु संयंत्र के सामने एक सैलून था,जहाँ परमाणु कार्यक्रम से जुड़े पाकिस्तानी वैज्ञानिक बाल कटाते थे।RAW के एजेंट उन कटे बालों को चुपके से चुराने लगे। फिर बालों के सैंपल को परीक्षण के लिए भारत भेजा। उनमें रेडिएशन पाया गया, जिससे साबित हो गया पाकिस्तान चोरी छिपे परमाणु कार्यक्रम चला रहा है।


अब सवाल ये था इसे रोका कैसा जाए ? इंदिरा गाँधी आपातकाल के बाद सत्ता खो चुकी थी। मोरार जी प्रधानमंत्री बने ,जोकि समर्पित गाँधीवादी थे। बस यहीं से पाकिस्तानी परमाणु कार्यक्रम को संजीवनी मिल गई। तत्कालीन RAW प्रमुख काव ने पूरा मामला उन्हे बताया और पाकिस्तानी परमाणु कार्यक्रम को खत्म करने के दो तरीकों को भी बताया।

  • रॉ ने एक पाकिस्तानी परमाणु वैज्ञानिक को अपने जाल में फंसा लिया था,जो कि 10000 अमेरिकी डॉलर में संयंत्र का नक्सा बेचने को तैयार हो गया था। किंतु गाँधीवादी मधुशाला में मदमस्त देसाई जी ने इसे पाकिस्तान का आंतरिक विषय बताते हुए पैसा देने से इंकार कर दिया।
  • दूसरा विकल्प मोसाद ने सुझाया था उसने गुजराती एयरफील्ड का इस्तेमाल कर परमाणु संयंत्र में बम गिराने की  योजना बनाई। इजरायल से पाकिस्तान की दूरी ज्यादा थी बीच में रिफ्यूलिंग की जरूरत पड़ती जो कि बीच में पड़ने वाले मुस्लिम राष्ट्रों द्वारा संभव नहीं था।लेकिन नित्यप्रति गाँधी के अहिंसक धतूरे का सेवन करने वाले देसाई ने इसकी भी अनुमति नहीं दी।

बात सिर्फ इतनी होती तो रॉ और मोसाद मामला संभाल लेती लेकिन तथाकथित अहिंसक प्रधानमंत्री देसाई के सैन्य तानाशाह जनरल जिया उल हक से बड़े दोस्ताना संबंध थे। वे अक्सर एक दूसरे का हालचाल जानने के लिए के लिए टेलीफोन वार्ता करते थे।एक दिन ऐसी ही सास बहू टाइप बातचीत में देसाई ने जिया उल हक को बता दिया कि हमें मालूम है कि आप परमाणु बम बना रहे हो लेकिन हम दोस्त हैं, शांति बनाए रखेगे।

बस यहीं से पाकिस्तान में रॉ एजेंटो का कत्लेआम शुरू हो गया और 1968 से बड़ी शिद्दत से तैयार रॉ का पूरा ढाँचा चरमरा गया। जो कि दोबारा 1980 में इंदिरा के आने पर ही मजबूत हुआ।

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